सेल्स ऑर्डर › सेल्स ऑर्डर और परचेज़ ऑर्डर
सेल्स ऑर्डर या परचेज़ ऑर्डर: कौन क्या भेजता है
एक ही सौदे में कई कागज़ बनते हैं। खरीदार परचेज़ ऑर्डर लिखता है, विक्रेता सेल्स ऑर्डर से उसकी पुष्टि करता है, माल चालान के साथ जाता है, और इनवॉइस सबसे आखिर में आता है। कौन सा क्या है, यह पता हो तो आपका और खरीदार का रिकॉर्ड मेल खाता रहता है।
एक नज़र में अंतर
| परचेज़ ऑर्डर | सेल्स ऑर्डर | टैक्स इनवॉइस | |
|---|---|---|---|
| कौन बनाता है | खरीदार | विक्रेता | विक्रेता |
| इसमें क्या लिखा होता है | "यह माल भेजिए" | "हमें मंज़ूर है, हम यह भेजेंगे" | "हमने यह भेजा; इतना बकाया है" |
| इसकी वजह से GST देना होगा? | नहीं | नहीं | हाँ, अगर विक्रेता रजिस्टर्ड है |
| GSTR-1 में जाता है? | नहीं | नहीं | हाँ |
| अकाउंट में एंट्री | कोई नहीं | कोई नहीं | बिक्री और बकाया रकम |
| नंबर सीरीज़ | खरीदार की (PO/…) | विक्रेता की (SO/…) | विक्रेता की इनवॉइस सीरीज़ |
परचेज़ ऑर्डर और सेल्स ऑर्डर बिज़नेस के रिकॉर्ड हैं, GST के डॉक्यूमेंट नहीं। GST सप्लाई और टैक्स इनवॉइस से जुड़ा है। फिर भी दोनों मिलकर दिखाते हैं कि ऑर्डर दिया गया और मंज़ूर हुआ, जो दाम, मात्रा या तारीख पर झगड़ा होने पर बहुत काम आता है।
ऑर्डर से बिल तक
- पूछताछ और कोटेशन। खरीदार पूछता है; आप कोटेशन मेकर से कोटेशन भेजते हैं।
- परचेज़ ऑर्डर। खरीदार अपना PO भेजता है। (अगर खरीदने वाले आप हैं, तो परचेज़ ऑर्डर मेकर आपका PO बनाता है।)
- सेल्स ऑर्डर। आप उसके PO नंबर के साथ सेल्स ऑर्डर से पुष्टि करते हैं। स्टेटस: खुला।
- डिस्पैच। माल टैक्स इनवॉइस के साथ जाता है, या डिलीवरी चालान के साथ, जहाँ इनवॉइस बाद में बनता है। खेप की वैल्यू लिमिट से ज़्यादा हो तो ई-वे बिल चाहिए (ज़्यादातर मामलों में ₹50,000; कुछ राज्य अपने अंदर माल ले जाने के लिए अपनी लिमिट रखते हैं)।
- इनवॉइस। सेल्स ऑर्डर पर इनवॉइस बनाएँ दबाएँ। स्टेटस: इनवॉइस बन गया।
अगर खरीदार ने PO भेजा है तो क्या सेल्स ऑर्डर चाहिए?
कानूनन नहीं, पर इन हालात में यह अच्छा तरीका है:
- आप उसके PO में कुछ भी बदलते हैं: दाम, मात्रा, तारीख, दूसरा आइटम;
- ऑर्डर बड़ा है या ऑर्डर पर बनना है, इसलिए माल खरीदने से पहले उसकी लिखित मंज़ूरी चाहिए;
- ऑर्डर हफ़्तों में हिस्सों में डिलीवर होगा;
- ऑर्डर फ़ोन या WhatsApp पर आया और कोई PO है ही नहीं।
हल किया हुआ उदाहरण
चंडीगढ़ का एक स्कूल ₹3,800 के हिसाब से 60 डेस्क का PO SCH/26/118 भेजता है। माँगी गई तारीख तक आप सिर्फ़ 40 दे सकते हैं और बाकी दो हफ़्ते बाद। आपके सेल्स ऑर्डर SO/26-27/021 में 60 डेस्क हैं, वैल्यू ₹2,28,000, CGST 9% ₹20,520 + SGST 9% ₹20,520, टोटल ₹2,69,040, और नोट में: "40 desks by 20 Nov 2026, 20 desks by 4 Dec 2026, as discussed." स्कूल WhatsApp पर "OK" लिख देता है, और अब दोनों के पास एक ही प्लान है। बाकी बात हिस्सों में डिलीवरी में है।
नंबर आपस में जोड़कर रखें
हर बाद वाला कागज़ अपने से पहले वाले का हवाला दे। सेल्स ऑर्डर पर खरीदार का PO नंबर हो; चालान और इनवॉइस पर सेल्स ऑर्डर और PO का। जब खरीदार की अकाउंट टीम आपका बिल जाँचती है, तो पहले उसे अपने PO से मिलाती है। अगर PO नंबर नहीं है या गलत है, तो अक्सर पेमेंट तब तक रुका रहता है जब तक कोई उसे ठीक न करे।